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ऑस्ट्रेलिया का विश्व कप में दोबारा खेलने का स्वप्न ३२ साल के लंबे इंतजार के बाद १७ नवंबर २००५ को पूरा हुआ। उरूग्वे के खिलाफ दूसरे चरण के प्ले ऑफ में स्थानापन्न खिलाड़ी जॉन अलोइसी ने शूट-आऊट में गोल कर सिडनी के टेलस्ट्रा स्टेड़ियम में मौजूद हजारों दर्शकों की तमन्ना पूर्ण की। ऑस्ट्रेलिया ने इसके पहले १९७४ के विश्व कप में भाग लिया था मगर वे प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर सके थे। उस साल भी वह जर्मनी में खेला गया था। इस बार ग्रुप मुकाबलों में उन्होने पाँच में से चार मैच जीते तथा एक ड्रॉ रहा था। उन्होने सोलोमन आयलैंड को ओशिनिया प्ले ऑफ में ९-० से रौंदकर उरूग्वे के साथ अंतिम भिड़ंत तय की थी। पहले चरण में ऑस्ट्रेलिया को ०-१ की हार झेलना पड़ी थी मगर दूसरे चरण में मार्को ब्रेसियानो ने गोल कर औसत स्कोर १-१ से बराबर कर दिया था। निर्धारित तथा अतिरिक्त समय तक दोनों टीमों का औसत स्कोर १-१ रहने के बाद पेनल्टी का सहारा लिया गया जिसमें ऑस्ट्रेलिया के गोलकीपर मार्क श्वार्ज़र ने बेहतरीन बचाव किए। उन्होने डारिओ रॉड्रिग्स तथा मार्सेलो झलायेटा द्वारा ली गई पेनल्टी को बचाकर अपनी टीम को जीतने में अहम भूमिका अदा की। इसके पहले चार बार - १९८५, १९९३, १९९७, २००१ - ऑस्ट्रेलिया आखिरी प्ले ऑफ में हार चुका है। दक्षिण कोरिया के पूर्व कोच गूस हिडिंक के मार्गदर्शन में ऑस्ट्रेलिया अब एक एशियाई टीम की हैसियत से जर्मनी में बेहतरीन प्रदर्शन करने को बेताब है। हिडिंक के पास प्रतिभाओं की कमी नहीं है और उनकी टीम के अधिकतर खिलाड़ी इंग्लिश प्रीमीयर लीग की टीमों की ओर से खेलते है। उनमें श्वार्ज़र, लुकास नील, टिम काहिल, मार्क विदुका, ब्रेट एमर्टन, क्रेग मूर तथा हैरी केवेल शामिल है।
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